🪔 तेनाली रामा की कहानियाँ

एपिसोड T19

गंध की क़ीमत

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तेनाली रामा की कहानियाँ विजयनगर साम्राज्य हास्य नैतिक कहानी
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📖 पढ़ने का समय: ~6 मिनट 👶 आयु: 6+ 📂 सीरीज़: तेनाली की कहानियाँ ✍️ प्रस्तुति: RayalSabha 📅 प्रकाशित: 2026-11-01
कहानी का सार

विजयनगर के बाज़ार में सुब्बय्या के टिफ़िन सेंटर के वड़ों की ख़ुशबू राह चलते लोगों के क़दम भी रोक लेती थी। पर लोगों को सूँघकर बिना कुछ ख़रीदे जाते देख लालची सुब्बय्या को एक अजीब तरकीब सूझी — "अब से ख़ुशबू के भी पैसे देने होंगे!" उसने लोगों से वसूली की, यहाँ तक कि एक किसान के बैल से भी। तब तेनाली रामकृष्ण सामने के पत्थर के चबूतरे पर बैठकर गाने लगे… ख़ुशबू की सही क़ीमत पर एक मज़ेदार कहानी।

01

चबूतरे पर गीत — पाँच वराह का बिल

विजयनगर का बाज़ार
चबूतरे पर गीत — पाँच वराह का बिल — तेनाली रामा की कहानी का दृश्य

सुब्बय्या के टिफ़िन सेंटर के सामने पत्थर के चबूतरे पर रामकृष्ण ने आँखें बंद कीं, दुकान की ख़ुशबू की लंबी साँस ली और गाने लगे।

🪶 तेनाली रामा (सुर में गाते हुए)
"खाओ तो वड़े ही खाओ, सुनो तो महाभारत ही सुनो, और सूँघो तो बस सुब्बय्या के सांबार की ख़ुशबू ही सूँघो!"

हाथ में ताड़पत्र का बही-खाता लिए सुब्बय्या अचानक उनके सामने आ खड़ा हुआ।

🍛 सुब्बय्या
"कवि जी, सांबार की ख़ुशबू के पाँच वराह हो गए!"

रामकृष्ण की भौंहें ऊपर उठ गईं… और फिर होंठों के कोने पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई।

सूँघने के भी पैसे? इस बाज़ार में असल में क्या हुआ, यह जानने के लिए शुरू से देखते हैं।

02

सुब्बय्या का टिफ़िन सेंटर — लालच का बीज

बाज़ार, सुबह
सुब्बय्या का टिफ़िन सेंटर — लालच का बीज — तेनाली रामा की कहानी का दृश्य

विजयनगर के बाज़ार में सुब्बय्या के टिफ़िन सेंटर को कौन नहीं जानता था। उसके वड़ों की ख़ुशबू से राह चलते लोग भी रुककर अंदर आ जाते थे।

* मज़े के लिए 'टिफ़िन' और 'सांबार' जैसे कुछ आज के शब्द इस्तेमाल किए गए हैं — उस ज़माने में ऐसी जगह को 'पूटकूळ्ळ इल्लु' (भोजनालय) कहते थे!

धंधा ख़ूब चला… पर सुब्बय्या का लालच उससे भी तेज़ बढ़ा।

बाहर दो राहगीर रुके, आँखें बंद करके लंबी साँस ली और बिना कुछ ख़रीदे मुस्कुराते हुए चले गए। सुब्बय्या की मुस्कान ग़ायब हो गई और आँखें सिकुड़ गईं।

🍛 सुब्बय्या (मन ही मन, ग़ुस्से में)
"देखो, देखो! मेरा घी, मेरा मसाला, मेरी मेहनत… और ये सब मुफ़्त में सूँघकर चले जाते हैं! अहा… एक तरकीब सूझी!"
03

नया बोर्ड — ख़ुशबू के भी पैसे!

दुकान के सामने

एक छोटे-से स्टूल पर खड़े होकर सुब्बय्या ने कीलों से एक बोर्ड ठोंका। ठक… ठक… ठक… फिर नीचे उतरकर उसे गर्व से निहारा।

बोर्ड: "अब से ख़ुशबू के भी पैसे देने होंगे!"

🚶 राहगीर 1
"क्या… ख़ुशबू के भी पैसे?"
🚶 राहगीर 2
"शुक्र है, अभी हवा पर टैक्स नहीं लगा!"

सुब्बय्या बही-खाता लेकर दौड़ा आया और दो उँगलियाँ दिखाईं।

🍛 सुब्बय्या
"रुकिए, रुकिए! बोर्ड पढ़ते हुए अभी आपने दो बार सूँघा। दो सिक्के हुए!"

दोनों ने गमछों से नाक ढकी और भाग खड़े हुए।

उस दिन से वह गली अजीब-सी हो गई। वहाँ से गुज़रने वाले हर किसी की नाक पर गमछे का पहरा था!

रामकृष्ण गली में आए, बोर्ड पढ़ा, एक भौंह उठाई और मुस्कुरा दिए।

🪶 तेनाली रामा (मन ही मन)
"ख़ुशबू की क़ीमत? देखते हैं, इस सुब्बय्या की चालाकी कहाँ तक जाती है।"
04

किसान और उसका बैल — बेज़ुबान से भी वसूली

दुकान के सामने
किसान और उसका बैल — बेज़ुबान से भी वसूली — तेनाली रामा की कहानी का दृश्य

वीरय्या अपना बैल लेकर गुज़र रहा था कि बैल दुकान के पास रुक गया, नाक ऊपर उठाई और ज़ोर से साँस खींची। कितना भी खींचो, टस से मस नहीं हुआ।

🍛 सुब्बय्या
"रुको, रुको! तुम्हारे बैल ने मेरे खाने की ख़ुशबू सूँघी है। उसका भी हिसाब लिख रहा हूँ!"
🐂 वीरय्या
"हुज़ूर, वह बैल है! उसे बोर्ड पढ़ना थोड़े ही आता है!"
🍛 सुब्बय्या
"पढ़ नहीं सकता तो क्या? नाक तो है! और बैल की नाक बड़ी होती है… इसलिए दुगना दाम!"

सुब्बय्या ने बही-खाते से बैल की नाक थपथपाई। बैल ने सिर उसके चेहरे तक बढ़ाया और ज़ोर से फुफकारा। सुब्बय्या डरकर पीछे उछल पड़ा।

🐂 वीरय्या (दुखी होकर एक सिक्का देते हुए)
"इस हफ़्ते बैल के चारे के लिए बचाए पैसे थे, हुज़ूर… वो भी गए।"

चबूतरे के खंभे के पास खड़े रामकृष्ण यह सब देखते हुए अपनी ठोड़ी सहलाने लगे।

🪶 तेनाली रामा (मन ही मन)
"इंसानों से आगे बढ़कर अब बेज़ुबान जानवरों से भी वसूली? अब इस सुब्बय्या की कहानी का अंत करना ही होगा।"
05

रामकृष्ण की तरकीब — चबूतरे पर बासी भात

अगली सुबह

रामकृष्ण जान-बूझकर दुकान के सामने चबूतरे पर बैठ गए और पत्ते में बाँधकर लाया बासी भात खोला। नाक पर गमछे बाँधे लोग रुककर हैरानी से देखने लगे।

🚶 राहगीर 1 (घबराकर)
"कवि जी, वहाँ मत बैठिए! नाक बंद कर लीजिए!"
🪶 तेनाली रामा (आँख मारते हुए)
"क्यों? इतनी अच्छी ख़ुशबू बर्बाद करना तो पाप है!"
🪶 तेनाली रामा (सुर में गाते हुए)
"खाओ तो वड़े ही खाओ, सुनो तो महाभारत ही सुनो, और सूँघो तो बस सुब्बय्या के सांबार की ख़ुशबू ही सूँघो!"

दुकान के खंभे के पीछे से सुब्बय्या देखता रहा, हर साँस पर बही-खाते में एक लकीर खींचता और हाथ मलता रहा।

🍛 सुब्बय्या (मन ही मन)
"अहा! आज तो बड़ी मछली हाथ लगी! राजा के दरबारी कवि से वसूली कर ली, तो पूरा शहर मुझसे डरेगा!"
06

बिल — आवाज़ से भुगतान!

चबूतरे के पास
बिल — आवाज़ से भुगतान! — तेनाली रामा की कहानी का दृश्य

सुब्बय्या अकड़ते हुए आया, बढ़-चढ़कर विनम्रता से नमस्कार किया और बोर्ड की ओर इशारा किया।

🍛 सुब्बय्या
"नमस्कार कवि जी! बोर्ड तो देखा है न? मेरे हिसाब से आपने तेईस बार ज़ोर से सूँघा है। कुल पाँच वराह!"
🪶 तेनाली रामा (शांति से)
"पाँच वराह? ठीक ही है, सुब्बय्या जी! आपके सांबार की ख़ुशबू है ही इतनी बढ़िया।"
🚶 राहगीर 1
"अरे! कवि जी से भी वसूली कर रहा है!"
🚶 राहगीर 2
"फिर हम जैसे लोग क्या कर सकते हैं?"
🐂 वीरय्या (बैल की गर्दन सहलाते हुए)
"मेरे बैल तक को नहीं छोड़ा… कवि जी को छोड़ेगा क्या?"

रामकृष्ण ने कमर से धीरे से थैली खोली। सुब्बय्या ने दाँत निपोरते हुए हथेली आगे बढ़ाई। रामकृष्ण ने थैली उसके कान के पास हिलाई… खन… खन… खन…! और थैली वापस कमर में खोंस ली।

🪶 तेनाली रामा
"यह रहा मेरा भुगतान! आपने ज़ोरदार ख़ुशबू दी, इसलिए मैंने ज़ोर से हिलाया। आवाज़ सुनाई दी? या एक बार और?"
🍛 सुब्बय्या (हकलाते हुए, पेट थपथपाते हुए)
"ये… ये क्या है कवि जी? आवाज़ से मेरा पेट भरेगा?"
🪶 तेनाली रामा
"क्या आपने मुझे खाना खिलाया? नहीं। सिर्फ़ ख़ुशबू दी। तो मैंने भी सिक्के नहीं दिए — सिर्फ़ सिक्कों की आवाज़ दी। ख़ुशबू के बदले आवाज़ — हिसाब बराबर हो गया!"

सुब्बय्या का मुँह खुला का खुला रह गया। लोगों को बात समझ आ गई।

07

सबका बिल — खन, खन, खन!

बाज़ार की गली
सबका बिल — खन, खन, खन! — तेनाली रामा की कहानी का दृश्य
🚶 राहगीर 2 (ठहाका लगाते हुए)
"यूँ ही थोड़े इन्हें विकटकवि कहते हैं!"

पूरी गली ठहाकों से गूँज उठी। सुब्बय्या हाथ बाँधे सबको घूरता रहा।

🚶 राहगीर 1 (बाएँ कान के पास थैली हिलाते हुए)
"यह रहा मेरा भुगतान सुब्बय्या जी, कल की ख़ुशबू का! खन, खन!"
🚶 राहगीर 2 (दाएँ कान के पास)
"मेरा परसों का! ज़ोर से हिला रहा हूँ, सुनाई दिया? खन, खन!"
🐂 वीरय्या (दुगनी तेज़ी से हिलाते हुए)
"यह मेरे बैल का भुगतान! बड़ी नाक है न… दुगनी आवाज़! खन-खन-खन-खन!"

बैल ने सिर हिलाया — उसके गले की घंटियाँ बज उठीं! सब लोग चारों ओर जमा होकर थैलियाँ हिलाने लगे। सुब्बय्या कान बंद करके इधर-उधर घूमने लगा।

🍛 सुब्बय्या (चिल्लाते हुए)
"बंद करो, बंद करो! मेरे कान फट रहे हैं!"
08

अंत — ख़ुशबू मुफ़्त है!

दुकान के सामने
🍛 सुब्बय्या (ग़ुस्से में, रामकृष्ण की ओर उँगली दिखाते हुए)
"यह सब आपका ही किया-धरा है, कवि जी! आपने पूरे शहर को मेरी दुकान पर भड़का दिया!"
🪶 तेनाली रामा (भोलेपन से कंधे उचकाते हुए)
"मैंने क्या किया, सुब्बय्या जी? आपने जो हिसाब सिखाया, वही मैंने शहर को सिखाया।"
🍛 सुब्बय्या (पगड़ी ठीक करते हुए, ज़िद से)
"अच्छा? तो कल से दरवाज़े बंद करके खाना बनाऊँगा! ख़ुशबू की एक बूँद भी बाहर नहीं जाने दूँगा!"
🪶 तेनाली रामा
"ठीक है। पर ख़ुशबू बाहर नहीं आएगी, तो लोग भी अंदर नहीं आएँगे। आपकी दुकान तक लोगों को वही ख़ुशबू तो लाती है, सुब्बय्या जी!"

सुब्बय्या मुँह खोले जम-सा गया। कुछ कहने को हुआ, रुका, फिर रुका… फिर पगड़ी उठाकर सिर खुजाने लगा। बैल ने आगे बढ़कर ठीक उसके मुँह के सामने ज़ोर से फुफकारा।

🍛 सुब्बय्या (जल्दी से सिक्का वीरय्या के हाथ में रखते हुए)
"ये लो, ये लो अपने पैसे! पहले अपने बैल को दूर ले जाओ!"
🪶 तेनाली रामा (भीड़ को शरारत से आँख मारते हुए)
"अगर फिर कभी ये ख़ुशबू का हिसाब लिखें… तो क्या करना है, पता है न?"

सबने अपनी थैलियाँ ऊपर उठाकर त्योहार की घंटियों की तरह हिलाईं। बैल की घंटियाँ भी साथ बज उठीं!

🍛 सुब्बय्या (झुँझलाकर हाथ ऊपर उठाते हुए)
"नहीं, नहीं… ठीक है, ठीक है!"

बड़बड़ाते हुए उसने पुराना बोर्ड उखाड़ा और कीलों से नया ठोंक दिया: "ख़ुशबू मुफ़्त है!" सब लोगों ने गमछे हटाए और एक साथ लंबी साँस ली — "आहा…!"

🍛 सुब्बय्या (ग़ुस्से में)
"सिर्फ़ ख़ुशबू मुफ़्त है! मेरे वड़े नहीं!"

रामकृष्ण, वीरय्या और सारी भीड़ ठहाका मारकर हँस पड़ी। बस सुब्बय्या हाथ बाँधे, भुनभुनाता खड़ा रहा।

🪶 तेनाली रामा (सुब्बय्या के कंधे पर हाथ रखकर)
"सुब्बय्या जी, लालच नुक़सान लाता है। बाँटने से धंधा बढ़ता है।"
कहानी की सीख 🍛

लालच नुक़सान लाता है — बाँटने से धंधा बढ़ता है।

💡 जीवन का पाठ

जो चीज़ अपने आप मुफ़्त है, उसकी क़ीमत वसूलने की कोशिश आख़िर में हमें ही नुक़सान पहुँचाती है। लोगों को हमारे पास हमारी भलाई लाती है — वह बेचने की चीज़ नहीं, बाँटने की चीज़ है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गंध की क़ीमत कहानी की सीख क्या है?
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लालच नुक़सान लाता है और बाँटने से धंधा बढ़ता है। मुफ़्त चीज़ की क़ीमत लगाने से आख़िर में हमारा ही नुक़सान होता है।

रामकृष्ण ने सुब्बय्या का बिल कैसे चुकाया?
+

उन्होंने सिक्कों की थैली सुब्बय्या के कान के पास हिलाई और वही आवाज़ भुगतान के रूप में दे दी। ख़ुशबू के बदले आवाज़ — हिसाब बराबर!

सुब्बय्या ने बैल से भी पैसे क्यों माँगे?
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उसने कहा कि बैल ने उसके खाने की ख़ुशबू सूँघी है, और बैल की नाक बड़ी होती है, इसलिए दुगना दाम। इससे पता चलता है कि उसके लालच की कोई हद नहीं थी।

इस कहानी में 'टिफ़िन' और 'सांबार' जैसे शब्द क्यों हैं?
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मज़े के लिए और आसानी से समझ आने के लिए आज के कुछ शब्द इस्तेमाल किए गए हैं। उस ज़माने में ऐसी जगह को 'पूटकूळ्ळ इल्लु' (भोजनालय) कहते थे।

क्या यह कहानी बच्चों के लिए उपयुक्त है?
+

हाँ — यह 6 साल और उससे बड़े बच्चों को ढेर सारी हँसी के साथ लालच के नुक़सान और बाँटने की ख़ुशी के बारे में सिखाती है।

यह वीडियो तेलुगु में है (अंग्रेज़ी सबटाइटल के साथ)।

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